मेरी माँ..!🤱🏻👵🏻

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हँस हँस कर वो मेरी हर ग़लतियाँ सहती है;
मेरा बच्चा, सबसे अच्छा, मेरी माँ कहती है।

सुबह जगने से लेकर, रात के सोने तक वो;
रब से मेरी ख़ुशियों की, इल्तिजा करती है॥

कभी बाबा की डाँट से जो सहम जाता हूँ मैं;
अपनी आँचल में छुपा, मेरीढालबनती है।

कभी कभी जब हो जाती है वो बीमार तब;
इस हाल में भी पहले सा ख़याल रखती है॥

जीवन की परेशानियों में, अगर उलझ जाऊँ;
हर बार जैसी आज भी मेरी रहनुमा बनती है।

नहीं रहती है हरपल जुबां पर लेकिनरासि’;
मेरे तो दिल में ममतामयी, मेरी माँ रहती है॥


✍🏻raj_sri

शीतलता की चादर लपेटे,
ये सुहानी धवल चाँदनी रात।
मंद मंद मदमस्त मलय का,
तुम्हारी गेसुओं से मुलाक़ात॥

झूम रही है डाली डाली,
पुलकित पेड़ पौधे खर-पात।
ऐसे में है मुश्किल रासि,
हृदय में छुपा रखना जज़्बात॥

✍🏻@raj_sri

तुम्हारी मुस्कुराहट..!

ग़मों में गुम ज़िंदगी में ख़ुशी की सुगबुगाहट।
नई उम्मीदें जगाती है तुम्हारी ये मुस्कुराहट॥

सब कुछ है बिखर रहा क्षीण हो रही ‘उमंग’;
ऐसे निराश मन में नई आशाओं की आहट।

पास पास रह कर भी बढ़ते जा रहे फ़ासले’;
ठण्डे पड़ रहे ‘रिश्तों’ को जैसे देती गर्माहट।

ईंट पत्थरों से बनी हुई इस दुनिया में ‘रासि’;
वीरां’ पड़े मकानों की जैसे नई सी सजावट।

___________________✍🏻@raj_sri

रात/Night॰॰॰ 🌃🌌

ऐ रात, कहाँ से तू आती है…!!
इतने सारे सपन सुहाने, किस गली से लाती है।
थके हारे सताये मन को ख़्वाबों से बहलाती है॥
ऐ रात, कहाँ से तू आती है…!!

दिन भर के प्रयास के बदले जो मिलता उपहास।
टूट जाता तन मन उसका और, हो जाता उदास॥
ऐसे टूटे बिखरे मन में हसीं तस्वीर तू सजाती है।
सच सच बता, ऐ रात, कहाँ से तू आती है…!!

चलते चलते कोई राही, राहों में जो थक जाये।
दिनभर की भागा-दौड़ी में जो लक्ष्य भटक जाये॥
ऐसे मायूस म्लान मन में नई ऊर्जा भर जाती है।
ऐ रात, क्या देवलोक से तू आती है..!?

दिन भर सूरज की गरमी में रासि झुलसती सी।
धूल धूसरित प्रदूषित हवा में वो सिसकती सी॥
धरती अंबर को शीतल चाँदनी से सहलाती है।
सच में , ऐ रात, कहाँ से तू आती है…!!

ऐ रात, कहाँ से तू आती है…!!

_________________✍🏻@raj_sri

PicCourtesy :- GoogleImeges

रिश्ता॰॰॰

दुनिया में चाहे कोई, कैसा भी हो रिश्ता।
दरकने ही लगता है आहिस्ता आहिस्ता॥

न सूरज की गरमी न चाँद की शीतलता।
रहती नहीं है मौसम में हरदम एकरसता॥
हरा भरा ही नही रहता हरा भरा गुलिस्तां।

नदियों में से पानी, और हवाओं में रवानी।
समय साथ ढल जाती, ये अल्हड़ जवानी॥
ये वो क़ायदे जिसे ना बदल पाए फ़रिश्ता।

कभी पुष्टिवर्धक तो, कभी धूप परेशानी।
एक जैसी नही रहती रासि’ ये जिंदगानी॥
करते फिर नज़रंदाज़ क्यूँ, बातें दानिस्ता।
______________✍🏻@raj_sri
*दानिस्ता – ज्ञात

चित्र :- गूगल

जानते तो थे॰॰॰

जानते तो थे उसे, कई ज़माने से।
बन के रह गये वो अब फ़साने से॥

जिनके आँखों पर कर के भरोसा;
तौबा कर लिया हमने मयख़ाने से॥

जिन गेसुओं तले गुज़री मेरी रातें;
हो के रह गए अब वो अनजाने से॥

जिस पहलू में रहना था ‘ज़िन्दा’;
वो ही लगने लगे उनको मसाने से॥

दे जाते हैं ‘अपने’ जो ज़ख़्म गहरे;
वो कहाँ भरते हैं रासि सहलाने से॥
______✍🏻@raj_sri

माँ जानती है॰॰॰🤰🏻🤱🏻

माँ जानती है मेरे दिल की हर बात।
मेरी हर तकलीफ़ें, मेरे हर जज़्बात॥

पढ़ लेती है वो माथे की मेरी लकीरें;
जान जाती बिन कहे, मेरे हर हालात।
माँ जानती है॰॰॰

बाबा की परछाई मैं दादा का दुलार;
ममता की मूरत माँ का मैं ख़यालात।
माँ जानती है॰॰॰

दुनिया के रण में जैसे बाबा मेरे ढाल;
आत्मबल बढ़ाती माँ बन ईश साक्षात।
माँ जानती है॰॰॰
____________✍🏻@raj_sri

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ज़िंदगी का हाथ..

हो कितने भी ‘रासि’ मुश्किल आयाम।
ना हो परेशान, ज़िंदगी का हाथ थाम॥

मातम मनाने से मौत क्या टल जायेगी?
डर के जीने से ज़िंदगी न बदल जायेगी।

हँस के जी आज, कल जो हो अंजाम।
ना हो परेशान, ज़िंदगी का हाथ थाम॥

दुश्वारियों से घबराने से क्या फ़ायदा?
अश्क़ आँखों में बहाने से क्या फ़ायदा?

दुखी दिन से भला सुख का इक शाम।
ना हो परेशान, ज़िंदगी का हाथ थाम॥
___________✍🏻@raj__sri

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सार्वभौमिक सत्य॰॰॰

जंगल बिन हरियाली कैसी, नदियाँ बिना जलधार।
चिड़ियाँ बिन चहचहाहट कैसी, बगिया बिन बहार॥

बिना मानवता का कैसा मन्दिर, या कैसा मज़ार।
वो मानुस मानुस कैसा जिसके, अंतस में न प्यार॥

बिना फल, तरुवर व्यर्थ, बिना जल का सरोवर।
बिन दयाभाव, दिल पत्थर, पाषाण का सहोदर॥

सूरज बिन गरमी व्यर्थ, चाँद व्यर्थ बिन शीतलता।
बिना परिश्रम रासि व्यर्थ, जो ग़र मिले सफलता॥
_________________✍🏻@raj_sri

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आशा॰॰॰😇

माना कि है अंधेरा घनेरा घनेरा,
मगर चाँदनी रात तो अपने संग है।
है उदासियों ने जमा रखा डेरा,
मगर मन में तो आशा की तरंग है॥

रेगिस्तां में नहीं मिलता है जल,
पर कैक्ट्सों के बीज पनपते तो हैं ही।
बर्फीली वादियों में है मुश्किल,
पर वहाँ भी कई जीव संवरते तो हैं ही॥

पत्थरों पर होने वाले अंकुरित,
बीजों में तो उम्मीदों की उमंग है।
है उदासियों ने जमा रखा डेरा,
मगर मन में तो आशा की तरंग है॥

युगों तक ज़िन्दा है रहना किसे,
है पल दो पल का तेरा मेरा बसेरा।
नही रहता कुछ एक सा हमेशा,
रासि स्याह रातें या, उजला सवेरा॥

है असां कहाँ जीना भी यहाँ पर,
ज़िंदगी का भी तो साँसों से जंग है।
है उदासियों ने जमा रखा डेरा,
मगर मन में तो आशा की तरंग है॥
_________✍🏻@raj_sri

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जय श्रीराम …🚩🙏🏻

परहित में त्यागे जो निज हित और मीत।
सीखो तुम श्रीराम से, रे मन मानुष रीत॥

संतों के संताप सुन, जो हो उठे अधीर,
युवा काल में ही हरे, जा के संतन पीर;

असुरों से अदावत और पत्थरों से प्रीत।
सीखो तुम श्रीराम से, रे मन मानुष रीत॥

पितृ वचन निभाने को औ’ बचाने लाज,
पल में वो परित्यागे, रत्नजड़ित वो राज;

छन में वन वरण किए, ना हुए भयभीत।
सीखो तुम श्रीराम से, रे मन मानुष रीत॥

कितने कष्ट सहे और, सहे सिया वियोग,
केवट शबरी से नेह पशु पंछी से सहयोग;

धैर्य धर्म विवेक बल जीते रासि अजीत।
सीखो तुम श्रीराम से, रे मन मानुष रीत॥
_✍🏻@raj__sri

*अजीत :- अपराजित (रावण)